शोधकर्ताओं ने पाया है कि चार में से एक धूम्रपान करने वाले को क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मनरी डिसीज (सीओपीडी) हो सकती है।
यह रोग फेफड़ों में होता है और एक बार होने के बाद इसकी तीव्रता बढ़ती जाती है, साथ ही अब तक इसका कोई इलाज नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि सीओपीडी का खतरा अंदाजे से कहीं ज्यादा है। शोध के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सीओपीडी ब्रोन्काइटिस और एम्फीसेमा से भी ज्यादा खतरनाक है। गौरतलब है कि ब्रोन्काइटिस और एम्फीसेमा में फेफड़ों में हवा का आना-जाना ब्लॉक हो जाता है यानी सांस लेने में दिक्कत होती है।
शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्ष का आधार 8000 व्यक्तियों पर किए गये अध्ययन को बनाया है। यह व्यक्ति 30 से 60 वर्ष की आयुवर्ग के थे और इनमें पुरुष और महिलाएं दोनों थे। अध्ययन 25 वर्षों तक किया गया। अध्ययन में शामिल वॉलंटियर्स में से 5000 से अधिक धूम्रपान करने वाले थे और 1200 से अधिक वे थे जिन्होंने धूम्रपान छोड़ दिया था। यह अध्ययन कोपेनहेगन सिटी हार्ट स्टडी का हिस्सा था। अध्ययन की शुरुआत में वालंटियर्स के फेफड़े सामान्य रूप से काम कर रहे थे और उन्हें श्वांस संबंधी कोई समस्या नहीं थी। शोध में पाया गया कि सिर्फ दस में से छह धूम्रपान करने वालों के फेफड़े सही काम कर रहे थे, जबकि धूम्रपान न करने वालों को कोई समस्या नहीं थी।
इसी तरह धूम्रपान न करने वाली महिलाओं में दस में से नौ के फेफड़े अध्ययन शुरू करते समय स्वस्थ थे लेकिन धूम्रपान करने वाली महिलाओं में दस में सात के फेफड़े ही सही थे। यह थी अध्ययन के शुरुआत में स्थिति। जब 25 वर्ष का अध्ययन पूरा हो गया तो चार में से एक धूम्रपान करने वाले ने गंभीर या मध्यम सीओपीडी विकसित कर ली। दिल्ली कीर्ति नगर स्थित कालरा अस्पताल के डा. आर.एन कालरा का कहते हैं कि चैन स्मोकिंग करने वालों को इस रोग का खतरा धूम्रपान न करने वालों की तुलना में छह गुना अधिक था और इनमें से चार में से एक को स्टेज-2 या हायर सीओपीडी होने का खतरा था शोधकर्ताओं का कहना है कि जिन लोगों ने अध्ययन शुरू होते ही धूम्रपान करना छोड़ दिया था, उनको इस रोग का खतरा कम हो गया। यही वजह थी कि धूम्रपान छोडऩे वाले वॉलंटियर्स में से किसी को भी गंभीर सीओपीडी नहीं हुई।
हम सब उन डरावनी सुर्खियों से वाकिफ हैं जिनमें कहा जाता है-धूम्रपान से फेफड़ों की बीमारी, स्ट्रोक, मुंह का कैंसर और हृदय रोग होता है। तथ्य यह है कि धूम्रपान से इनके अलावा भी और बहुत सी बीमारियां हो जाती हैं, जिनके बारे में आपको जानकारी भी नहीं होती। अमेरिका के मशहूर लेखक मार्क ट्वेन ने एक बार कहा था कि धूम्रपान छोडऩा बहुत आसान है। मैंने तो यह काम कई हजार बार किया है। बहरहाल जब भी कोई धूम्रपान करने वाला सिगरेट कम करना या छोडऩा चाहता है तो निकोटीन की गैर-मौजूदगी समस्याएं खड़ी कर देती हैं। धूम्रपान छोडऩा इसलिए कठिन हो जाता है, क्योंकि निकोटीन की गैर-मौजूदगी पर जिस्म प्रतिक्रिया करता है। इंसान को कमजोरी सी महसूस होने लगती है और यही चीज उसे सिगरेट के लिए बेचैन कर देती है।