एक बाबा ऐसा भी …
एक दिन उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति गंगा के किनारे गन्दगी में ही तर्पण कर रहा है।



 अमूमन लोग एक नाव कर, थोड़ा आगे बह रही धारा तक जाते है जहाँ बहाव भी है और पानी भी निर्मल। विकास जी से रहा नहीं गया, पूछने पर उस व्यक्ति ने बताया वो अपनी पत्नी की अस्थियाँ विसर्जित करने आया है पर उसके पास इतने पैसे नहीं है कि वो नाव कर सके। वे हिल गए, क्या व्यक्ति को अपनी आस्था और इतनी सी इच्छा के लिए भी पैसे का मुँह देखना पड़ेगा? काश! गंगा स्वच्छ होती।
घर पहुँचते-पहुँचते भावनाएँ इतनी घनीभूत हो गयी थीं कि बाकि जीवन उन्होंने गंगा को देने का निश्चय कर लिया। ये बात 1998 की है। वे डबल एम.ए. हैं, और चम्पारण कॉलेज में लेक्चरार रहे पर उनके भाई का वहाँ के डी.एम. से किसी विवाद के चलते उनके परिवार को इतना परेशान किया गया कि उन्हें अपना घर छोड़ पटना आना पड़ा था। नियति शायद उनसे कुछ महत्ती करवाना चाहती थी और यह उस योजना का एक हिस्सा भर था। गंगा से जुड़े तो जाना कि इसके मैला होने के लिए 74% नालियों का पानी और 24% कारखानों कचरा जिम्मेवार है और मात्र 2% धार्मिक आस्थाएँ।
कुछ ही दिनों में मालूम चला कि पटना मेडिकल कॉलेज वाले ‘बॉडीज’ को यूँ ही गंगा में बहा देते हैं और फिर उन्हें कुत्ते और दूसरे जानवर नौचते हैं और न जाने क्या-क्या। उन्होंने प्रशासन से गुहार लगाई पर कॉलेज वाले साफ मुकर गए। उन्होंने उन शवों के फोटो खींचे, सौ लोगों की मानव-श्रृंखला बनाई, और पूरे पटना में बात को आग की तरह फैला दिया। आखिर हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और प्रशासन को उनके सम्मानपूर्वक दाह-सँस्कार के लिए जिम्मेवार ठहराया।
उन्हें सरकारों के कानों तक अपनी बात पहुँचाने का रास्ता समझ आ गया था। वे अब तक 38 जनहित याचिकायें दायर कर चुके, और अब तक आए सारे फैसले उनके और गंगा के हक में ही रहे। 2009 में उन्हें पाँच लाख का पुरस्कार मिला, उसकी भी उन्होंने इसी यज्ञ में आहुति दे दी। यदि आप कभी पटना में गंगा किनारे जाएँ, और कोई व्यक्ति कुछ लोगों के साथ फावड़ा-तगारी से कचरा उठाता, लावारिस लाशों का अंतिम-सँस्कार करता या घाट पर लोगों को इकट्ठा कर ये समझाता मिल जाए कि यदि आप गंगा सफाई को एक घण्टा भी दें तो उसका पुण्य और किसी धार्मिक अनुष्ठान से ज्यादा है तो बेशक वे विकास चन्द्रा ही हैं जिन्हें अब वहाँ लोग इस नाम से नहीं बल्कि गुड्डू-बाबा के नाम से जानते हैं।

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